
छत्तीसगढ़ के गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले का राजमेरगढ़… प्राकृतिक सुंदरता ऐसी कि यहां से अमरकंटक की मनोरम वादियां और पूरे जिले का विहंगम नजारा दिखाई देता है। वर्ष 2025 में इसी राजमेरगढ़ को सर्वश्रेष्ठ इको-टूरिज्म स्थल का पुरस्कार भी मिला। लेकिन पुरस्कारों की चमक के पीछे यहां की जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है।

सालों से अधूरा पड़ा रिसॉर्ट, अधूरा मड हाउस, बिखरी निर्माण सामग्री और बदहाल भवन! आखिर पर्यटन विकास के नाम पर शुरू हुए निर्माण कार्य अपनी मंजिल तक क्यों नहीं पहुंचे? क्या बजट की कमी हर अधूरे काम का जवाब है? और यदि निर्माण के लिए राशि खर्च की गई, तो उसकी गुणवत्ता, सुरक्षा और रखरखाव की जिम्मेदारी किसकी है?

आज सवाल सिर्फ राजमेरगढ़ की बदहाली का नहीं, बल्कि वन विभाग की कार्यप्रणाली और जवाबदेही का भी है। देखिए अंशु सोनी की यह ग्राउंड रिपोर्ट।
राजमेरगढ़ की प्राकृतिक खूबसूरती इसे प्रदेश के प्रमुख पर्यटन स्थलों में शामिल करने की क्षमता रखती है। लेकिन यहां पहुंचने वाले पर्यटकों को यदि प्राकृतिक नजारों के बीच अधूरे भवन और खंडहरनुमा निर्माण दिखाई दें, तो पर्यटन विकास के दावों पर सवाल उठना लाजिमी है।
जानकारी के मुताबिक, वर्ष 2008 के आसपास यहां पर्यटन और वन विभाग की ओर से रिसॉर्ट निर्माण का काम शुरू कराया गया था। लेकिन वर्षों बीत जाने के बाद भी यह निर्माण पूरा नहीं हो सका। समय के साथ भवन की हालत खराब होती गई और आज यह सरकारी योजनाओं की अधूरी कहानी जैसा नजर आता है।
सवाल है—जिस निर्माण पर कभी सरकारी धन खर्च किया गया, वह आज इस हालत में क्यों है? क्या निर्माण के बाद उसकी निगरानी नहीं हुई? क्या जिम्मेदार अधिकारियों ने कभी इसकी सुध ली? और यदि ली, तो अब तक इसका समाधान क्यों नहीं निकला?
राजमेरगढ़ में बदहाली की कहानी केवल पुराने रिसॉर्ट तक सीमित नहीं है। करीब दो साल पहले यहां मड हाउस का निर्माण कार्य भी शुरू कराया गया था, लेकिन यह काम भी अधूरा पड़ा है।
पर्यटन को बढ़ावा देने के नाम पर नई सुविधाएं विकसित करने की योजना बनाई जाती है, बजट की मांग होती है और निर्माण कार्य शुरू होते हैं। लेकिन जब यही काम अधूरे रह जाते हैं, तो योजना का लाभ पर्यटकों को कैसे मिलेगा?
वन विभाग का कहना है कि जितना बजट उपलब्ध कराया गया, उतने का काम कराया गया है और शेष कार्य के लिए दोबारा बजट की मांग की गई है।
लेकिन यहां सवाल उठता है कि यदि बजट कम था, तो निर्माण कार्य की योजना और चरणबद्ध क्रियान्वयन कैसे तय किया गया? यदि बजट खत्म होने के कारण काम रुका, तो अब तक आगे की स्वीकृति के लिए क्या ठोस पहल हुई? और अधूरे निर्माण को खराब होने से बचाने की जिम्मेदारी किस अधिकारी की है?
डीएफओ के जवाब से कब मिलेगी राहत?
इस पूरे मामले में जब वनमंडल अधिकारी से बात की गई, तो उन्होंने बताया कि उन्हें पदभार संभाले ज्यादा समय नहीं हुआ है। इसलिए राजमेरगढ़ का निरीक्षण कर वहां की स्थिति और अधूरे निर्माण कार्यों की जानकारी ली जाएगी। इसके बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी।
डीएफओ का यह बयान अपनी जगह है, लेकिन सवाल यह है कि राजमेरगढ़ की समस्याओं के समाधान के लिए अब तक क्या कार्रवाई हुई? क्या निरीक्षण के बाद जिम्मेदारियां तय होंगी? क्या अधूरे निर्माण की तकनीकी जांच कराई जाएगी? और क्या जनता को यह बताया जाएगा कि काम पूरा करने की समय-सीमा क्या है?
नए अधिकारी के लिए निरीक्षण करना जरूरी हो सकता है, लेकिन पर्यटन स्थल की बदहाली को दूर करने के लिए केवल निरीक्षण नहीं, बल्कि ठोस कार्ययोजना और समयबद्ध कार्रवाई भी जरूरी है।
निर्माण की गुणवत्ता और सुरक्षा पर सवाल
ग्राउंड रिपोर्ट के दौरान निर्माण स्थल पर कांच समेत अन्य सामग्री टूटी-फूटी और बिखरी हुई दिखाई देती है। यह स्थिति निर्माण कार्यों की सुरक्षा, रखरखाव और निगरानी को लेकर गंभीर सवाल खड़े करती है।
यदि निर्माण कार्य बजट के अभाव में रुके हैं, तो भी अधूरे भवनों और वहां मौजूद सामग्री को सुरक्षित रखना संबंधित विभाग की प्राथमिकता होनी चाहिए।
आखिर निर्माण स्थल की नियमित निगरानी कौन कर रहा है? क्या अधूरे भवनों की सुरक्षा के लिए कोई व्यवस्था है? क्या अब तक कराए गए काम की गुणवत्ता का तकनीकी परीक्षण हुआ है? और यदि निर्माण सामग्री क्षतिग्रस्त हुई है, तो उसके कारणों की जांच किसने की?








